(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.148. अध्यायः 148
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
व्याधेन विमानस्थयोर्दर्शनम्॥ 1॥ ततो व्याधेन दावाग्नौ शरीरत्यागेन स्वर्धगमनम्॥ 2॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच। 12-148-0x(5788)(70892)
वमानस्थौ तु तौ राजंल्लुब्धकः ग्वे ददर्श ह।
दृष्ट्वा तौ दंपती राजन्व्यचिन्तयत तां गतिम्॥ 12-148-1(70893)
कीदृशेनेह तपसा गच्छेयं परमां गतिम्।
इति बुद्ध्या विनिश्चित्य गमनायोपचक्रमे॥ 12-148-2(70894)
महाप्रस्थानमाश्रित्य लुब्धकः पक्षिजीवकः।
निश्चष्टो मरुदाहारो निर्ममः स्वर्गकाङ्क्षया॥ 12-148-3(70895)
ततोऽपश्यत्सुविस्तीर्णं हृद्यं पद्माभिभूषितम्।
नानापक्षिगणाकीर्णं सरः शीतजलं शिवम्॥ 12-148-4(70896)
पिपांसार्तोऽपि तदृष्ट्वा तृप्तः स्यान्नात्र संशयः॥ 12-148-5(70897)
उपवासकृशोऽत्यर्थं स तु पार्थिव लुब्धकः।
उपसृत्य तु तद्धृष्टः श्वापदाध्युपितं वनम्॥ 12-148-6(70898)
महान्तं निश्चयं कृत्वा लुब्धकः प्रविवेश ह।
प्रविशन्नेव स वनं निगृहीतः स कण्टकैः॥ 12-148-7(70899)
स कण्टकैर्विभिन्नाङ्गो लोहितार्द्रीकृतच्छविः।
वभ्राम तस्मिन्विजने नानामृगसमाकुले॥ 12-148-8(70900)
ततो द्रुमाणां महतां पवनेन वने तदा।
उदतिष्ठत संघर्षान्सुमहान्हव्यवाहनः॥ 12-148-9(70901)
तद्वनं वृक्षसंकीर्णं लताविटपसंकुलम्।
ददाह पावकः क्रुद्धो युगान्ताग्निसमप्रभः॥ 12-148-10(70902)
स ज्वलैः पवनोद्भूतैर्विस्फुलिङ्गैः समन्ततः।
ददाह तद्वनं घोरं मृगपक्षिसमाकुलम्॥ 12-148-11(70903)
ततः स देहमोक्षार्थं संप्रहृष्टेन चेतसा।
अभ्यधावत वर्धन्तं पावकं लुब्धकस्तदा॥ 12-148-12(70904)
ततस्तेनाग्निना दग्धो लुब्धको नष्टकल्मषः।
जगाम परमां सिद्धिं ततो भरतसत्तम॥ 12-148-13(70905)
ततः स्वर्गस्थमात्मानमपश्यद्विगतज्वरः।
यक्षगन्धर्वसिद्धानां मध्ये भ्राजन्तमिन्द्रवत्॥ 12-148-14(70906)
एवं खलु कपोतश्च कपोती च पतिव्रता।
लुब्धकेन सह स्वर्गं गताः पुण्येन कर्मणा॥ 12-148-15(70907)
याऽन्या चैवंविधा नारी भर्तारमनुवर्तते।
विराजते हि सा क्षिप्रं कपोतीव दिवि स्थिता॥ 12-148-16(70908)
एवमेतत्पुरावृत्तं लुब्धकस्य महात्मनः।
कपोतस्य च धर्मिष्ठा गतिः पुण्येन कर्मणा॥ 12-148-17(70909)
यश्चेदं शृणुयान्नित्यं यश्चेदं परिकीर्तयेत्।
नाशुभं विद्यते तस्य मनसाऽपि प्रमादतः॥ 12-148-18(70910)
युधिष्ठिर महानेष धर्मो धर्मभृतां वर।
गोघ्नेष्वपि भवेदस्मिन्निष्कृतिः पापकर्मणः॥ 12-148-19(70911)
न निष्कृतिर्भवेत्तस्य यो हन्याच्छरणागतम्।
इतिहासमिमं श्रुत्वा पुण्यं पापप्रणाशनम्।
न दुर्गतिप्रवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति॥ ॥ 12-148-20(70912)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ 148॥


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